विजयादशमी विशेष: सत्य, शील और मर्यादित शक्तियों की होगी जीत

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क्रोध, अहंकार जैसी आसुरी शक्तियों को हराने के लिए दैवीय चेतना को हमारे भीतर जाग्रत करना आवश्यक है और इसके लिए ध्यान, प्राणायाम का नियमित अभ्यास आपकी सहायता करेगा। जिसे करने से तन-मन और बुद्धि शुद्ध हो जाती है। हम अपनी चेतना की गहराई में उतरने लगते हैं।

मारी परंपरा में चैत्र और आश्विन माह के पहले नौ दिन मां दुर्गा की आराधना को समर्पित हैं। यह भौतिक जगत से अलौकिक जगत की ओर बढ़ने का समय है। अलौकिक जगत ही सत्य है और यह सब पर्व मनाने का औचित्य ही है अपने भीतर के अहंकार का दमन कर उस पर विजय प्राप्त करना।

हमारे देश में विजयादशमी के दिन रावण दहन की परंपरा है। रावण अहंकार का प्रतीक है। अहंकार हमेशा बड़ा प्रतीत होता है और राम आत्मा के प्रतीक हैं। अहंकार पहाड़ के समान होता है और आत्मा इसकी तुलना में छोटी होती है, अंगूठे से भी छोटी। यदि दहन के समय भी आप रावण का पुतला देखें तो वह बहुत बड़ा होता है और दहन करनेवाले रामजी छोटे-से होते हैं। इसके पीछे का जो गूढ़ अर्थ है, वह यह है कि हमारी आत्मा बहुत छोटी और अदृश्य होती है परंतु यह अत्यंत बलशाली होती है। वहीं अहंकार, अपने खोखलेपन के कारण बड़ा प्रतीत होता है और आत्मज्ञान होने पर वह भस्म हो जाता है।

एक अहंकारी व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं हो सकता। विजयादशमी एक सुअवसर है प्रसन्न होने के लिए। इस दिन अपनी सभी नकारात्मकताओं का त्याग कर सकारात्मकता की ओर बढ़ें। जो राग-द्वेष आपने अपने भीतर वर्षभर में एकत्रित किया है, उन सबको मिटा दें और प्रसन्नता में खिल जाएं। जैसे नित्य स्नान करने से शरीर का मैल दूर हो जाता है, ठीक वैसे ही अपने मन से भी सब मैल धो दें। जब तक ज्ञान का हमारे भीतर पूर्ण रूप से उदय नहीं होता, तब तक राग-द्वेष जैसी आसुरी शक्तियां हमें परेशान करती रहती हैं। ज्ञान, ध्यान और सत्संग वह रामबाण है, जिनके माध्यम से आप अपने भीतर की सभी आसुरी शक्तियों को जड़ से मिटा सकते हैं। राम के अयोध्या लौट आने का एक गूढ़ अर्थ है। अयोध्या अर्थात जहां युद्ध न हो। जहां किसी को भी किसी प्रकार की चोट नहीं पहुंचे। तो आखिर वह क्या है? वह है हमारा शरीर, जो प्रकृति की ओर से मिला एक सुंदर उपहार है। ऐसे शरीर रूपी अयोध्या में आत्मज्ञान होने पर हर क्षण विजय ही विजय है।

क्रोध, अहंकार जैसी आसुरी शक्तियों को हराने के लिए दैवीय चेतना को हमारे भीतर जाग्रत करना आवश्यक है और इसके लिए ध्यान, प्राणायाम का नियमित अभ्यास आपकी सहायता करेगा। जिसे करने से तन-मन और बुद्धि शुद्ध हो जाती है। साथ ही मंत्रोच्चार करने से हमारा कण-कण खिल उठता है। हम अपनी चेतना की गहराई में उतरने लगते हैं।

नवरात्रि में उपवास का बहुत महत्व है। उपवास करने से शरीर की शुद्धि होती है परंतु अपने यहां उपवास के समय लोग फल कम, आलू, मखाने या मिठाई का सेवन अधिक करते हैं, ऐसा नहीं करें। अपनी प्रकृति के अनुसार उपवास का पालन करें। इस समय फलाहार करें, साथ ही दूध अथवा नारियल पानी भी पी सकते हैं। कुछ दिनों के लिए अपने शरीर को विश्राम दें। इससे शरीर के विषाक्त पदार्थ दूर होते हैं। हमारे पूर्वज इस बात को जानते थे इसीलिए उन्होंने हर पूजा-पाठ में व्रत और ध्यान को बहुत महत्व दिया।

विजयादशमी के दिन यह जान लें कि हमारे भीतर जो भी नकारात्मकता थी, वो दूर हो गई है और हम बच्चों जैसे हो गए हैं। जब आप बच्चे थे, तब आपके मन में किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं था। इसलिए बच्चों को भगवान का रूप कहा गया है।

जीवन में न कुछ बुरा है, न ही सब कुछ अच्छा है। बस, यह जान लेना ही ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह मत सोचना कि, अरे! यह तो बहुत कठिन है, मुझसे नहीं होगा। आप में वह शक्ति है कि आप सभी कठिनाइयों से पार पा सकते हैं। यह मानकर चलें कि मां दुर्गा की शक्ति आपके साथ है और आप राम की तरह अवश्य सफल होंगे।



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